डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर

जब डॉ बाबासाहेब आंबेडकर बड़ौदा में नौकरी करने गए थे …..

                                          

यह सच है कि डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर समझौते के अनुसार नौकरी के लिए बड़ौदा आए, लेकिन इतने उच्च शिक्षित विद्वान को बड़ौदा में रहने या खाने के लिए जगह नहीं मिली। क्योंकि वह जाति से महार (अछूत) थे! आखिरकार उन्हें अपना नाम बदलना पड़ा और छुपेनाम से एक पारसी छात्रावास में शरण लेनी पड़ी। उन्होंने सयाजीराव महाराज के सैन्य अधिकारी के रूप में काम करना शुरू किया।

महार होनेके कारण डॉ आंबेडकर से उनके कार्यालय के साथी उनसे बात करने अथवा उनके साथ बैठनेसे भी हिचकिचाते थे. उनसे बात करने से या छुनेसे बात करनेवाला और छूनेवाला अपवित्र हो जाएगा इस वजेसे उनके कार्यालय के लोग काम की कागज़-फाइल्स दूरसे ही उनके पास फेकते थे जब डॉ आंबेडकर कार्यालय के बाहर निकलते थे तो वहां के लोग उनसे दूर हो जाते थे जिससे उनकी परछाई उनपर ना पड़े।  जहाँपर डॉ आंबेडकर बैठते थे वह जगह हर रोज कार्यालय के लोग गोमूत्र से पूरा कार्यालय शुद्ध करते थे।  उनको  पानी पीनेसे भी वंचित किया जाता था उनके लिए अलग पानी का मटका रखते थे।  एक दिन किसीने पारसी छात्रावास के अधिकारियो के पास चुगली की की डॉ आंबेडकर पारसी नहीं बल्कि महार है जिससे पारसियोंको ग़ुस्सा आया और डॉ आंबेडकर को छात्रावास से निकाल दिया। 

डॉ आंबेडकर प्यास भूक भुलाकर बरोदा के एक पार्क में जाकर पेड़ के नीचे बैठकर बहोत देर तक रोये थे , उनके पास एक और अनुभव आया  था कि कैसे कोई व्यक्ति धर्म के नाम पर हृदयहीन हो सकता है। भले हीअछूत कितना भी पढ़ ले वह रहेगा अछूत ही ऐसी उस वक्त के लोगो की मानसिकता थी बरोदा से नौकरी छोड़कर अम्बेडकर वापस मुंबई आ गए लेकिन अभी भी उनके पास कोई काम नहीं था जिससे उनका घर कैसे चलेगा इस बात की उन्हें चिंता सताने लगी इसके चलते डॉ आंबेडकर के एक मित्र ने उनको २ विद्यार्थी पढ़ने के लिए दिए जिन्हे डॉ आंबेडकर पढ़ाते थे।  उन विद्यार्थियों को पढ़ाते समय ही उन्होंने शेयरों और शेयरों के कारोबार में लोगों को सलाह देना शुरू किया लेकिन जब लोगों को पता चला कि डॉ आंबेडकर एक महार है, तो कोई भी सलाह के लिएआना बंद कर दिया, इसलिए उन्होंने सलाह देना बंद कर दिया और एक पारसी व्यापारी के पास पत्राचार और लेखांकन का काम स्वीकार किया। अपना घर खर्चा निकालते हुए भी उन्होंने पढाई नहीं छोड़ी ।उनका इस समय के आसपास ही शोध प्रबंध “कास्ट इन इंडिया” पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ था।  इसी दौर में उन्हें पता चला की सिडनहॅम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर की एक जगह रिक्त हो गयी तो उन्होंने उस कॉलेज में उस रिक्त हुए जगह के लिए आवेदन किया जिसके बाद उन्हें नियुक्त किया गया। 

जब डॉ आंबेडकर ने एक प्रोफेसर के रूप में कक्षा में जाना शुरू किया, तो वहां के छात्रोने डॉ आंबेडकर को बुरा भला कहना सुरु कर दिया वह कहते थे, “यह महार क्या सिखाएगा? वह अंग्रेजी भी नहीं बोल सकता।” हालांकि,जब डॉ आंबेडकर ने पढाना चालु किया उन्हें देखकर छात्र भी उसके प्रति आकर्षित हो गए। डॉ आंबेडकर अपने विषय को बेहद तत्परता से छात्रों को पढ़ाते थे। वह खुद से पढ़ते थे और फिर पढ़ाते थे। वह इस प्रकार एक सफल प्रोफेसर बन गये लेकिन फिर भी एक महार के रूप में उसकी अवमानना ​​नहीं रुकी।

संकलन- रिपब्लिकन चळवळ टीम 

संदर्भ:- डॉ बाबासाहेब आंबेडकर यांची जीवनगाथा 

लेखक :- राजा मंगळवेढेकर (पान क्रमांक-१९/२०)

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